कुछ छूट जाने की कसक तथा जो कुछ बचा रह गया था उसे सवांर लेने की चाहत


गुंजन की दिनभर की  दिनचर्या कुछ इस प्रकार थी कि शायद ही मुश्किल से कुछ रविवार और पर्व त्योहारों की छुट्टियों के अलावे की छुट्टियों के अलावे उसे अन्य  कभी कोई छुट्टी मिलती हो।  और शादी के बाद तो उसकी जिंदगी कितनी बदल गई थी न |
शादी के बाद शुरुआत के कुछ दिनों तक तो कुछ दिनों तक तो उसे
अपने घर और ऑफिस वाली स्थिति में सामंजस्य बिठाते-बिठाते कब साल बीत गए पता ही नहीं चला | इसी बीच एक बेटी के बाप बनने का परम सौभाग्य भी उसे प्राप्त हुआ | अब बच्ची के आ जाने के बाद जिम्मेदारियां भी कुछ बढ़ गई थी | दिनभर ऑफिस का काम , देर शाम घर आने के बाद बच्चे की समस्या , रात को 2-3 बजे तक बेटी के जग जाने जाने के कारण उसे सुलाना , डायपर बदलना , दूध की बोतल भर कर देना , आधी अधूरी नींद के साथ अगले दिन फिर ऑफिस,  ऑफिस में दिनभर जम्हाई लेना ,  कितनी ही इस तरह की जिम्मेदारियां बढ़ गई थी उन दिनों।

आज जब उसकी बेटी की विदाई हो रही थी तो बेटी ने जाते वक्त अपनी नानी को, मां को ,  दादा दादी को ,  अन्य सभी सगे संबंधियों को गले लगा कर खूब रोया खूब रोया | सभी की आंखों में आंसू थे | जब बेटी ने अपने बाप को गले लगाया और प्रणाम किया तो बेटी रोशनी की आंखों में आंसू छलछला  गए | लेकिन गुंजन बिलकुल इस एहसास से अछुता  रहा | उसे बिल्कुल सामान्य सा लग रहा था | उसे  लग रहा था कि  जैसे बेटी हॉस्टल जा रही हो जा रही हो , जैसे बेटी को स्कूल में ऐडमिशन करवाने के बाद छोड़ दिया गया था , ठीक उसी तरह जैसे ग्रेजुएशन के लिए 3 साल पहले बेटी को दिल्ली जा रही थी | वह इस बात को एहसास नहीं कर पा रहा था कि अब उसकी बेटी उसकी नहीं रही, पराई धन हो चुकी है लेकिन जब उसने सभी के चेहरे पर दुख उदासी और और आंसू तथा बेटी की विदाई का गम देखा तो वह समझ नहीं  पा रहा था कि किस प्रकार की प्रतिक्रिया दूं |
फिर भी उसने भारी मन से बेटी को आशीर्वाद दिया और जब बारात विदा हो चुकी थी ,  शाम तक घर के सभी मेहमान जा चुके थे सिवाय एक दो को छोडकर | जो घर आज  15 दिनों से मेहमानों सगे संबंधियों से भरा पूरा लग रहा था अचानक से सुना सुना लगने लगा | टेंट, समियाना, हलवाई ,कारीगर सब अपना सामान बांध रहे थे तो  शाम के वक्त गुंजन छत पर बैठकर नीले आकाश को देखते हुए दूर कहीं गहरे विचारों में डूबा हुआ था | कब शाम ढल गई और और आकाश एक गहरे काले समंदर में बदल गया उसे कुछ पता ही नहीं चला | आज उसे अपनी बेटी का वह चेहरा याद आ रहा  था जब पहली बार उसे गोद में उठाया था - मात्र 1 दिन की तो थी ही , वह कितनी प्यारी गुड़िया लग रही थी।
वह अकेले में बैठा बार-बार अपनी बेटी के पूरे बचपन बचपन से लेकर आज तक के दिन को याद करने की कोशिश कर रहा था लेकिन मना पटल पर कहीं भी बेटी का चेहरा नहीं आ पा रहा था | बस जन्म के कुछ सप्ताह तक उसे गोद में खिलाना, कभी बेटी का कॉलेज में एडमिशन करवाने ले जाना, तो कभी फोन पर पर भेजा हुआ कुछ फोटो,  बस यही सब उसके मन के चलचित्रों में चल रहा था | उसे लग रहा था कि उसके रोशनी से जुड़ाव का संसार और उसकी यादें इतनी सीमित तरीके से क्यों याद आ रही है ? क्यों नहीं मन के उन चित्रों को विस्तार दे पा रहा है जिसमें उसके पूरे बचपन से लेकर अब तक तक की तस्वीर थी? क्यों नहीं आज बेटी को विदा करते समय उसकी आंखों में आंसू आए ?

इतने में उसकी पत्नी पल्लवी ने नीचे से आवाज दी- “ खाना लगा दिया है सभी इंतजार कर रहे हैं नीचे आ जाइए

लेकिन उसने कोई उत्तर नहीं दिया | शायद वह पहले अपने मन की अनसुलझे सवालों का उत्तर खोजने की कोशिश कर रहा था | वह याद करने की कोशिश कर रहा था कि –
 कब उसने रोशनी को अपनी सहेलियों के साथ लुकाछिपी खेलते देखा था ?
  कब उसने अपनी बेटी को बगीचों में स्वच्छंद रूप से आम चुनते देखा था ?
 बगीचा में झूला झूलते देखा था?
 दीपावली पर अपने साथ पटाखे फोड़ते, दीयों को जलाते को जलाते देखा था ?
 जितना ज्यादा हुआ वह इन  सवालों के जवाब को ढूंढने की कोशिश करता उतना ही ज्यादा वह  बेटी के दूर जाने का एहसास जाने का एहसास कर पा रहा था |
उसने अब अपने पिता होने के दायित्व का अपराधबोध भीतर से छलनी कर रहा था | अब उसे धीरे धीरे सारी गुत्थियाँ सुलझी हुई लगने लगी | उसे लगा कि वह अपनी बेटी के लिए अब तक जिंदगी में उसके पास वक्त  ही कहाँ था ? कब समय बिता पाया था उसने अपनी बेटी के साथ ?  परिवार के साथ ? जब बेटी 2 -3  महीने की थी तो उसने उसे मां के साथ नानी घर भेज दिया था - जब 2 साल की हुई तो वापस लाकर प्ले स्कूल में भेजना शुरू कर दिया | बस शाम को ऑफिस से आने के बाद बच्ची से कभी कबार  थोड़ी लाड़ दुलार कर पाला | ज्यादातर ऑफिस से आने तक वह सो चुकी चुकी होती थी फिर अगले 12 सालों तक यही दिनचर्या रही , कुछ छुट्टी और पर्व त्योहारों के दिनों को छोड़कर | 12वीं के बाद तो फिर वह दिल्ली ही चली गई | लगातार 5 सालों तक तक अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के दौरान ही शादी भी लग गई और आज बेटी की विदाई भी हो चुकी है |
 अब उसे एहसास हो रहा था कि कितनी जल्दी 24 साल बीत गए| उसने अपने बच्चों के लिए पैसा कमाना उनकी जरूरतों को पूरा करने के अलावे किया ही क्या है अब तक ? क्या एक पिता की जिम्मेदारी सिर्फ इतनी ही होती है कि बच्चों के लिए, परिवार के लिए, बस एक सुरक्षित चारदीवारी भर बना दे | बेटी के जन्म के बाद नानी घर , उसके बाद पढ़ाई और फिर आज विदाई | 24 सालों में कुछ गिने-चुने ही दिन थे जब उसने पूरी तरह अपने दिन  अपने परिवार तथा बच्चों के साथ समय बिता पाया था | आज उसे एहसास हो रहा था कि हो रहा था कि कहीं ना कहीं कोई कमी रह गई थी अपने बच्चे की पूरी परवरिश में | अब उसे अपनी जिंदगी कुछ अलग तरह से नजर आ रही थी , कुछ छूट जाने की कसक  तथा जो कुछ बचा रह गया था उसे सवांर  लेने की चाहत|
 इतने में पल्लवी ने फिर से से नीचे खाने के लिए आवाज लगाई लगाई |

By – GANGESH GUNJAN
         Godda , Jharkhand
         M- 9576632105

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