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कुछ छूट जाने की कसक तथा जो कुछ बचा रह गया था उसे सवांर लेने की चाहत

गुंजन की दिनभर की   दिनचर्या कुछ इस प्रकार थी कि शायद ही मुश्किल से कुछ रविवार और पर्व त्योहारों की छुट्टियों के अलावे की छुट्टियों के अलावे उसे अन्य   कभी कोई छुट्टी मिलती हो।   और शादी के बाद तो उसकी जिंदगी कितनी बदल गई थी न | शादी के बाद शुरुआत के कुछ दिनों तक तो कुछ दिनों तक तो उसे अपने घर और ऑफिस वाली स्थिति में सामंजस्य बिठाते-बिठाते कब साल बीत गए पता ही नहीं चला | इसी बीच एक बेटी के बाप बनने का परम सौभाग्य भी उसे प्राप्त हुआ | अब बच्ची के आ जाने के बाद जिम्मेदारियां भी कुछ बढ़ गई थी | दिनभर ऑफिस का काम , देर शाम घर आने के बाद बच्चे की समस्या , रात को 2 - 3 बजे तक बेटी के जग जाने जाने के कारण उसे सुलाना , डायपर बदलना , दूध की बोतल भर कर देना , आधी अधूरी नींद के साथ अगले दिन फिर ऑफिस,   ऑफिस में दिनभर जम्हाई लेना ,   कितनी ही इस तरह की जिम्मेदारियां बढ़ गई थी उन दिनों। आज जब उसकी बेटी की विदाई हो रही थी तो बेटी ने जाते वक्त अपनी नानी को, मां को ,   दादा दादी को ,   अन्य सभी सगे संबंधियों को गले लगा कर खूब रोया खूब रोया | सभी की आंखों म...